The Quality of life | Major Reasons Behind of all Our Sarrow

What is the biggest cause of our misery in the world? "If we pay attention, it is an important question for us that life is not going as we want. We have assumed that all these sorrows are due to external causes. Grieving the Loss of Hopes and Dreams, the Unique Loneliness of Grief, Coping with Grief and Loss. Solutions our all sarrow, misery,grief. The Unique Loneliness of Grief.

Namaskaram, I hope you all are healthy and doing well in your life.

I also hope that you must have read my previous blog (The Choice between Complaints, Learnig and Handling ) and while reading it, you must have  got many questions in your mind, out of which you may have got answers of some questions. And perhaps one of them must have been the question "What is the biggest reason of our misery in the world?"  If we pay attention then it is an important question for us that life is not going as we want.

 See, if you have paid attention to yourself and the people around you, then you must have seen that most of us are unhappy because of some other person, whether he is our friend or partner or spouse or a member of our family.  .
 Because when we have an extreme attachment to one person, then naturally we start hating many other people.  Although all of us may have our own reasons for this, perhaps the real reason is somewhat different.

 Let us ask ourselves a question "Is it easy to change our thinking or the world?"  Obviously it is easy to change your thinking. So now the question is that when our thoughts are so important to us, have we taken the power of our thinking into our hands?  The answer is "no". We are just fallen from our world of fame.

 Think what will happen if all our dreams are fulfilled? Surely we will end because our expectations are born out of the limited scenery of life. Therefore, if we want to achieve something greater in our physical life, then we should not expect. Lack of hope does not mean that we do not have direction. We just have to move in some direction without counting it all the time. On the contrary, if we have expectations, we mostly waste our intensity in unnecessary thoughts, as a result of which we will not be able to go far.

 See, hope is dominating us because from childhood, when we are about 3-4 years old, people often start asking us what will become of us when we grow up? Apart from this, the expectations that our parents have given us since childhood are mostly far from the truth, which turns out to be bad for both us and our parents.

 Along with this,"One reason for our unhappiness is that we seek happiness in our future tomorrow and not in today."

 Suppose we have a wish for ourselves in the future and if it is not fulfilled then we are more sad as well as the strength of our hope becomes stronger. And conversely, suppose we are in bliss right now and we want something to happen. Now we try for it but what if it goes away instead of being completed? So it will not hurt us much because we are happy.

That is, when we try to do anything in the world without improving ourselves, we mostly get sadness. Lord Shri Krishna has also said in Srimad Bhagavad Gita-

 "Yogastha: Kuru Karmani"

 That is, 'Settle in yoga and then work' (Perform your duty and abandon all attachment to success or failure. Such equality of mind is called Yoga).

 Now the question is, what to do so that we do not experience grief?
You just do it. Forget what you want from this world or from people or from yourself. First understand that whatever happens inside you, you will decide yourself, only you. As a result, you will start choosing to be happy yourself. Because when we go behind anything with pleasure, then it will most likely be true and even if it is not done then you will not make much difference.

 We are young now so it is time to establish ourselves and not run away with any hope.

 Thank you.


Hindi Translation: नमस्कार, मुझे आशा है कि आप सभी स्वस्थ होंगे और अपने जीवन में अच्छा कर रहे होंगे।
मैं आपसे यह भी आशा करता हूं कि आपने मेरा पिछला blog ( The Choice between Complaints, Learnig and Handling )पढ़ा होगा और उसे पढ़ते समय आपके मन में कई सारे सवाल भी आए होंगे जिनमें से कुछ के जवाब आपको मिल भी गए होंगे। और शायद उनमें से एक सवाल यह भी रहा होगा कि आखिर "दुनिया में हमारे दुख का सबसे बड़ा कारण क्या है?" अगर हम ध्यान दें तो यह हमारे लिए एक जरूरी प्रश्न है कि जैसा हम चाहते हैं जिंदगी वैसे नहीं चल रही।
देखिए, अगर आपने खुद पर और अपने आसपास के लोगों पर ध्यान दिया होगा तो आपने देखा होगा कि हम में से ज्यादातर लोग किसी दूसरे इंसान के कारण ही दुखी हैं फिर चाहे वह हमारा दोस्त या साथी या जीवनसाथी या हमारे परिवार का ही कोई सदस्य हो।
क्योंकि जब हम किसी एक इंसान से हद से ज्यादा लगाव रखते हैं तो स्वाभाविक रूप से हम कई दूसरे लोगों से नफरत करने लगते हैं। हालांकि हम सभी के पास इसके अपने कारण हो सकते हैं पर शायद इसका वास्तविक कारण कुछ दूसरा ही है।
चलिए हम खुद से एक प्रश्न करते हैं कि "अपनी सोच बदलना आसान है या दुनिया को?" जाहिर है खुद की सोच बदलना आसान है। तो अब प्रश्न यह है कि जब हमारे लिए हमारे विचारों का इतना ज्यादा महत्व है तो क्या हमने अपने सोचने की ताकत को अपने हाथों में लिया है? उत्तर है "नहीं"। हम बस अपनी ख्याली दुनिया से गिरे हुए हैं।
सोचिए कि यदि हमारे सभी सपने पूरे हो जाएं तो क्या होगा? निश्चित रूप से हम खत्म हो जाएंगे क्योंकि हमारी उम्मीदें जीवन की सीमित दृश्यों से पैदा होती हैं। इसलिए अगर हम अपने भौतिक जीवन में कुछ बड़ा या ज्यादा से ज्यादा हासिल करना चाहते हैं तो हमें उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। उम्मीद न होने का अर्थ यह नहीं कि हमारे पास दिशा ना हो। हमें हर समय उसका हिसाब ना लगाते हुए बस किसी दिशा पर आगे बढ़ना है। इसके विपरीत यदि हम उम्मीदें रखते हैं तो ज्यादातर हम अपनी तीव्रता फालतू विचारों में बर्बाद करते हैं जिसके फलस्वरूप हम ज्यादा दूर नहीं जा सकेंगे।
देखिए, उम्मीद हम पर हावी इसीलिए हो रही हैं क्योंकि बचपन से ही जब हम करीब 3-4 वर्ष के होते हैं तभी से लोग अक्सर हम से पूछने लगते हैं कि बड़े होकर क्या बनोगे? इसके अलावा बचपन से ही हमारे माता-पिता हम से जो उम्मीदें लगा लेते हैं वह ज्यादातर सच्चाई से इतनी दूर होती हैं जोकि हमारे और हमारे माता-पिता दोनों के लिए बुरी साबित होती हैं।
इसके साथ ही "हमारे दुखी होने का एक कारण यह भी है कि हम अपने आने वाले कल में खुशियां तलाशते हैं आज में नहीं।"
मान लीजिए हम भविष्य में अपने लिए कोई इच्छा रखते हैं और यदि वह पूरी नहीं हुई तो हम और भी ज्यादा दुखी होते हैं साथ ही हमारी उम्मीद की ताकत और भी मजबूत होती जाती है। और इसके विपरीत, मान लीजिए कि हम अभी एकदम आनंद में हैं और हम चाहते हैं कि कुछ ऐसा हो जाए। अब हम इसके लिए प्रयास करते हैं परंतु वह पूरी होने के बजाय और दूर हो जाए तो क्या होगा? तो इससे हमें कुछ खास दुख नहीं होगा क्योंकि हम खुश हैं। 
अर्थात जब हम बिना खुद में सुधार किए दुनिया में कुछ भी करने की कोशिश करते हैं तो ज्यादातर हमें दुख ही प्राप्त होता है। भगवान श्री कृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद्गीता मे कहा है- 
"योगस्थः कुरु कर्माणि"
अर्थात 'योग में स्थित हो जाओ फिर कार्य करो' (अपना कर्तव्य निभाएं और सफलता या असफलता के लिए सभी लगाव को त्याग दें। मन की ऐसी समता को ही योग कहा जाता है।)

अब सवाल यह है कि ऐसा क्या करें कि हमें दुख का अनुभव ना हो?
आप सिर्फ इतना कीजिए। भूल जाइए कि आपको इस दुनिया से या लोगों से या खुद से क्या चाहिए। पहले यह समझिए कि आपके अंदर जो भी कुछ होता है उसे आप खुद तय करेंगे, सिर्फ आप। जिसके फलस्वरूप आप खुद ही खुश होना चुनने लगेंगे। क्योंकि जब हम आनंद मन से किसी भी चीज के पीछे जाएंगे तो उसके सच होने की संभावना सबसे अधिक होगी और यदि ऐसा नहीं भी हुआ तब भी आपको इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।
हम अभी युवा हैं इसलिए अभी यह समय खुद को स्थापित करने का है ना कि किसी उम्मीद के साथ भागने का।
धन्यवाद।

Yogesh Maurya

Author & Editor

Hi! I introduce myself as Yogesh Maurya and I'm still a student. I'm little complecated. In short, "It is not possible for everyone to read me... I'm the book in which emotions are written instead of words..."

44 komentar:

  1. बहुत उम्दा लेख बाबू

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  2. बहुत प्रखर और सामायिक चिंतन प्रिय 👌🕉🧘‍♂️

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    1. हृदय से धन्यवाद 🙂🙏

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  3. Now u become much mature prsn broo good content.....

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  4. bhai website ki template aur dono sahi me bht achhe h

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  5. thank you for these information

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  6. बेहतरीन👍👍

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