Condemning is critically not criticism

What is the difference between to condemn and to criticize? It is written in the scriptures and many thinkers have said that condemnation is a problem

Namaskaram, I hope you all are healthy and doing well in your life.
Condemnation and Criticism
In today's article, we will talk about condemnation and criticism. Because in my experience many people are not clear about condemnation and criticism.

See, it is written in the scriptures and, saints and many thinkers have always said that condemnation is a big problem and defect. Because of condemnation not only the love to a person and society is destroyed but also the truth of our own soul is destroyed. And we know that the destruction of truth has been considered the biggest problem and the biggest curse.

Now surely a question must be coming in your mind- 

how can truth be destroyed by condemnation?

See, first of all we have to understand that what is condemnation? What is the real meaning of condemnation? Perhaps you may think that if we do not like someone's work, then criticizing it can be called condemnation.

 But in reality it is not so at all. Because we all have the right to criticize. Rather, criticism is the responsibility of all of us. Because criticism only cleanses society. And the person who criticizes also has to work hard to prove his point to be true and he may have to explain his point on many levels. As a result, the person criticizing also becomes strong and influential from within himself over time.
Then the question is- 

What is the difference between criticism and condemnation?

See, criticism is always about a person's work, whereas condemnation is about a person's personality. The purpose of criticism is to push someone forward, but the purpose of condemnation is to pull someone back. Behind condemnation are expressions of hatred and criticism is followed by feelings of compassion.

'That person did wrong.' - It is criticism to say.
'That person is wrong.' - It is blasphemous to say.

We need to think deeply about this. Because any human being can change at any time. Today a person doing wrong and unfair can also become a monk or a gentleman tomorrow. You already know many examples of this.
We have to understand that someone's mistake or any inappropriate act of someone becomes the dirt of his soul, the dirt is not the quality of that cloth. That is, it is not bad to see fault in someone's work but it is unfair to see fault in someone. Because to see or show defects in a person's personality or existence is called condemnation.

Also, it is not necessary to give proof of condemnation. Because the evil of an action can be shown but it is not easy to show the good or evil of the soul. This is why we have great fun condemning someone. By proving someone bad, we prove ourselves good in our own mind. And we do not have to work hard to be good and do good.

See, condemnation gives pleasure to our ego. This is why we get addicted to condemnation while condemning. But we must think about what harm we have from condemnation.

When we become a habit of condemnation, we start resorting to more and more untruths. Due to which, the truth is slowly destroyed from our heart. In addition, condemnation has both effects. The reputation of the one we condemn decreases. And the soul of the slanderer breaks.
In the end, I just request you to think, meditate, contemplate all these subjects.

Thank you.

निंदा आलोचनात्मक रूप से आलोचना नहीं है
नमस्कार, मुझे आशा है कि आप सभी स्वस्थ होंगे और अपने जीवन में अच्छा कर रहे होंगे।
आज के इस लेख में हम बात करेंगे निंदा और आलोचना की। क्योंकि मेरे अनुभव में कई लोगों को निंदा तथा आलोचना के बारे में स्पष्टता नहीं है।
देखिए शास्त्रों में लिखा है, संतो ने तथा कई विचारकों ने सदैव ही कहा है कि निंदा करना एक बड़ी समस्या तथा खराबी है। निंदा के कारण न केवल किसी व्यक्ति तथा समाज से प्रेम का नाश होता है बल्कि हमारी खुद की आत्मा के सत्य का भी नाश हो जाता है। और हम जानते हैं कि सत्य के नाश को सबसे बड़ी समस्या तथा सबसे बड़ा श्राप माना गया है।

अब निश्चित ही आपके मन में यह प्रश्न अवश्य आ रहा होगा कि आखिर निंदा से सत्य का नाश कैसे होता है?
 देखिए, सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि निंदा आखिर है क्या? निंदा का वास्तविक अर्थ क्या है? शायद आपको यह लग सकता है कि यदि किसी का कोई कार्य हमें पसंद ना आए तो उसकी आलोचना करने को निंदा कहा जा सकता है। 
परंतु वास्तव में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि आलोचना करने का तो हम सबको अधिकार है। बल्कि आलोचना करना तो हम सबका उत्तरदायित्व है। क्योंकि आलोचना से ही समाज शुद्ध होता है। और आलोचना करने वाले व्यक्ति को अपनी बात सत्य साबित करने के लिए मेहनत भी करनी पड़ती है तथा उसे कई स्तरों पर अपनी बात स्पष्ट करनी पड़ सकती है। जिसके फलस्वरूप आलोचना करने वाला व्यक्ति भी समय के साथ स्वयं अंदर से मजबूत तथा अभिप्रभवी होता जाता है।

अब प्रश्न यह है कि आलोचना तथा निंदा में अंतर क्या है?
देखिए आलोचना सदैव ही किसी व्यक्ति के कार्य की होती है, जबकि निंदा किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की होती है। आलोचना करने का उद्देश्य किसी को आगे बढ़ाना है परंतु निंदा करने का उद्देश्य किसी को पीछे खींचना है। निंदा के पीछे घृणा के भाव होते हैं और आलोचना के पीछे करुणा के भाव होते हैं।
'उस व्यक्ति ने गलत किया।' - यह कहना आलोचना है।
 'वो व्यक्ति गलत है।' - यह कहना निंदा है।
हमें इस बात पर गहराई से विचार करना आवश्यक है। क्योंकि किसी भी इंसान में किसी भी समय परिवर्तन आ सकता है। आज गलत तथा अनुचित करने वाला व्यक्ति कल साधु या सज्जन इंसान भी बन सकता है। इसके कई उदाहरण तो आप पहले से ही जानते हैं।

हमें यह बात समझना होगा कि किसी की गलती या किसी का कोई अनुचित कार्य उसकी आत्मा का मैल बन जाता है, मैल उस कपड़े का गुण नहीं। अर्थात किसी के कार्य में दोष देखना बुरा नहीं परंतु किसी व्यक्ति में दोष देखना अनुचित है। क्योंकि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व अथवा वजूद में दोष देखने या दिखाने को ही निंदा कहते हैं।
इसके साथ ही निंदा का प्रमाण देना भी आवश्यक नहीं। क्योंकि किसी कार्य की बुराई तो दिखाई जा सकती है परंतु आत्मा की अच्छाई या बुराई दिखाना आसान नहीं। यही कारण है कि हमें किसी की निंदा करने में बहुत मजा आता है। किसी दूसरे को बुरा सिद्ध कर हम अपने ही मन में स्वयं को अच्छा सिद्ध कर लेते हैं। और हमें अच्छा बनने तथा अच्छा करने की मेहनत नहीं करनी पड़ती।

देखिए, निंदा हमारे अहंकार को सुख देती है। यही कारण है कि निंदा करते हुए हमें निंदा करने की लत लग जाती है। परंतु निंदा करने से हमें क्या नुकसान है हमें इस बारे में विचार अवश्य करना चाहिए।

निंदा करने की आदत बन जाने पर हम अधिक से अधिक असत्य का सहारा लेने लगते हैं। जिसके कारण धीरे-धीरे हमारे हृदय से सत्य का नाश होने लगता है। इसके साथ ही निंदा का प्रभाव दोनों तरफ होता है। हम जिसकी निंदा करते हैं, उसकी प्रतिष्ठा घट जाती है। और निंदा करने वाले की आत्मा टूट जाती है।
अंत में मेरा आप से बस इतना ही अनुरोध है कि आप इन सभी विषयों पर विचार, मनन, चिंतन अवश्य कीजिएगा।
धन्यवाद।

Yogesh Maurya

Author & Editor

Hi! I introduce myself as Yogesh Maurya and I'm still a student. I'm little complecated. In short, "It is not possible for everyone to read me... I'm the book in which emotions are written instead of words..."

27 komentar:

  1. बहुत खूब ����
    बेहतरीन��

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  2. This topic is really nice, personally I liked it

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  3. Nice content
    So interesting
    Gud job
    well done
    Baba

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